किस घटना से बदला इसराइल के प्रति रुख़

युद्ध विराम के बाद नए सिरे से शुरू हुए युद्ध के पाँच दिन बाद एक इसराइली सैन्य यूनिट ने मेडिकल काफ़िले पर हमला किया.

इस हमले में मारे गए लोगों और गोलियों से छलनी उनकी गाड़ियों को रेत में दफन कर दिया. इस सामूहिक क़ब्र में एक शव के पास मिले मोबाइल फोन के वीडियो ने इसराइली सेना के बयान को झूठा साबित किया था.

इसराइल ने पहले ये दावा किया था कि यह काफिला हेडलाइट या फ्लैश लाइट के बिना अंधेरे में “संदिग्ध रूप से” आगे बढ़ा, इसलिए इसराइली सैनिकों ने गोलीबारी की.

कहा गया था कि इन वाहनों की आवाजाही के पहले सेना को जानकारी नहीं दी गई थी या इसके लिए सेना के साथ सहमति नहीं हुई थी.

जबकि मारे गए पैरामेडिक्स में से एक के फ़ोन से रिकॉर्ड किए गए वीडियो फुटेज से पता चला कि घायल लोगों की मदद के लिए जब आवाज़ लगाई जा रही थी तो गाड़ियों की लाइटें जल रहीं थीं.

इसराइली सेना ने बाद में माना कि जब सैनिकों ने गोलीबारी की तो मारे गए लोगों के पास कोई हथियार नहीं थे.

तब से न केवल इसराइल के सामान्य विरोधियों के बीच चिंता तेजी से बढ़ी है बल्कि फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों के नेतृत्व में इसके यूरोपीय सहयोगी भी इसराइल के ख़िलाफ़ अपनी भाषा को सख्त कर रहे हैं.

इसराइल के लिए इससे भी ज़्यादा बड़ी बात यह है कि बयान में कहा गया है, “जब तक नेतन्याहू सरकार इन जघन्य कार्रवाइयों को जारी रखेगी, हम चुप नहीं बैठेंगे. अगर इसराइल ने सैन्य आक्रमण बंद नहीं किए और मानवीय सहायता पर अपने प्रतिबंध नहीं हटाए, तो हम जवाब में और भी ठोस कदम उठाएंगे.”

उन्होंने यह नहीं बताया कि ये कदम क्या हो सकते हैं. एक संभावना ये हो सकती है कि ये देश इसराइल पर किसी तरह का प्रतिबंध लगा दें.

जबकि एक बड़ा कदम फ़लस्तीन को एक स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता देना भी हो सकता है.

क्योंकि फ़्रांस जून की शुरुआत में न्यूयॉर्क में सऊदी अरब के साथ सह-अध्यक्षता में आयोजित एक सम्मेलन में ऐसा करने वाले 148 अन्य देशों में शामिल होने पर विचार कर रहा है.

वहीं ब्रिटेन ने भी फ्रांस के साथ फ़लस्तीन को मान्यता देने के बारे में बात की है.

इसराइल ने इसका कड़ा प्रतिरोध करते हुए कहा है कि ये देश हमास को जीत दिलाएंगे. लेकिन फ्रांस, ब्रिटेन और कनाडा के बयानों के लहज़े से पता चलता है कि इसराइल उन पर दबाव बनाने की अपनी क्षमता खो रहा है.

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